
बार बार मै सोचता हूँ
आदमी जाने क्या क्या सोचता है
नही सोचे तो क्या करे ?
सोचना ही पड़ता है
हम सोचना बंद नहीं कर सकते
सोचना बंद करना हमारे हाथ में नही है
वैसे ही जैसे हम आँखे बंद कर सकते हैं
लेकिन कान बंद नही कर सकते
हमारा सोचना पूर्व धारणाओं पर आधारित होता है
तो
हम जो सोचते हैं क्या वो बाद में सच साबित होता है ?
नहीं
तो हम जो सोचते हैं उस सोच से बाहर निकल कर ही
हम सच जान पाएंगे
वो सच बहुत ही खूबसूरत है
आप वो सच देखेंगे ?
बहुत मज़ा आएगा .
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